घटना का पता रविवार सुबह उस समय चला, जब ग्रामीणों ने ऊंटनी को टंकी में फंसा देखा। इसके बाद पटवारी और ऊंटनी मालिक को सूचना दी गई।
पटवारी अमित ने बताया कि रात में ऊंटनी पानी पीने के लिए टंकी के पास पहुंची थी। टंकी में पानी काफी नीचे था, ऐसे में पानी पीने के प्रयास में उसकी गर्दन लोहे के नल और दीवार के बीच फंस गई। लंबे समय तक फंसे रहने के कारण उसकी मौत हो गई।
ग्रामीण नरेंद्र सिंह ने बताया कि इलाके में फलसूंड परियोजना के जरिए टंकी और जीएलआर में पानी सप्लाई होता है, लेकिन वर्तमान में महीने में केवल एक या दो बार ही पानी पहुंच रहा है। गर्मी के कारण अधिकतर समय टंकियां और जीएलआर खाली पड़े रहते हैं। ऐसे में पशु पानी की तलाश में भटकते रहते हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि ऊंटनी की मौत सीधे तौर पर प्यास और पानी की कमी से जुड़ी हुई है। यदि टंकी में पर्याप्त पानी होता तो शायद यह हादसा नहीं होता।
पटवारी की कार्रवाई के बाद ग्रामीणों की मदद से ऊंटनी मालिक मोटाराम देवासी ने ऊंटनी को दफना दिया। घटना के बाद इलाके में पानी संकट को लेकर ग्रामीणों में नाराजगी भी देखने को मिली।
