राजस्थान सरकार की ग्रामीण प्रशासन को जनता के दरवाजे तक पहुंचाने की महत्वाकांक्षी “रात्रि चौपाल” पहल अब अधिकारियों की उदासीनता के कारण सवालों के घेरे में आ गई है। मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद प्रदेश के अधिकांश प्रशासनिक अधिकारी इस अभियान को गंभीरता से लेते नजर नहीं आ रहे हैं।
सरकार की ओर से सभी जिला कलेक्टरों को निर्देश दिए गए थे कि वे प्रत्येक माह कम से कम चार रात्रि विश्राम और चौपाल गांवों में आयोजित करें। साथ ही प्रभारी सचिवों को भी नियमित रूप से गांवों में पहुंचकर जनता की समस्याएं सुनने और मौके पर समाधान सुनिश्चित करने के आदेश दिए गए थे। उद्देश्य साफ था—ग्रामीणों को जिला मुख्यालयों के चक्कर न काटने पड़ें और प्रशासन खुद गांवों तक पहुंचे।
मुख्यमंत्री ने स्वयं इस अभियान की शुरुआत करते हुए चित्तौड़गढ़ जिले के बंबोरी गांव में रात्रि चौपाल लगाई थी। वहां उन्होंने ग्रामीणों की समस्याएं सुनीं और कई मामलों का मौके पर निस्तारण भी किया। इसके बाद उपमुख्यमंत्री, मंत्री और कई विधायक भी गांवों में पहुंचकर रात्रि चौपाल कार्यक्रमों में शामिल हुए।
लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग दिखाई दे रही है। प्रदेश के 41 जिला कलेक्टरों में से अब तक केवल 18 कलेक्टरों ने ही रात्रि चौपाल आयोजित की है। इतना ही नहीं, किसी भी कलेक्टर ने निर्धारित चार चौपालों का लक्ष्य पूरा नहीं किया। प्रभारी सचिवों की सक्रियता भी बेहद सीमित रही है।
प्रशासनिक हलकों में यह चर्चा का विषय बन गया है कि आखिर मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद अधिकारी गांवों में जाने से क्यों बच रहे हैं। कई जिलों में चौपाल कार्यक्रम केवल औपचारिकता तक सीमित होकर रह गए हैं, जबकि कई स्थानों पर कार्यक्रम आयोजित ही नहीं हुए।
ग्रामीण क्षेत्रों में लोग उम्मीद लगाए बैठे हैं कि अधिकारी गांवों में पहुंचेंगे तो वर्षों से लंबित समस्याओं का समाधान होगा। लेकिन अधिकारियों की सुस्ती ने सरकार की इस पहल की रफ्तार को धीमा कर दिया है। राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में अब यह सवाल उठने लगा है कि क्या अधिकारियों की जवाबदेही तय होगी या यह अभियान भी सिर्फ कागजों तक सिमट कर रह जाएगा।