यह फैसला राजस्थानी भाषा और मातृभाषा आधारित शिक्षा को बढ़ावा देने की दिशा में ऐतिहासिक माना जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा की लाखों बच्चों को अपनी मातृभाषा में शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार मिलना चाहिए और राज्य सरकार को इस दिशा में प्रभावी नीति बनानी होगी।
तीन जजों की पीठ ने दिया आदेश
यह आदेश जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस विजय विश्नोई की तीन सदस्यीय पीठ ने सुनाया। अदालत ने कहा कि संविधान के प्रावधानों और नई शिक्षा नीति 2020 (NEP 2020) के अनुसार मातृभाषा आधारित शिक्षा को बढ़ावा देना जरूरी है।
पीठ ने स्पष्ट कहा कि राजस्थान सरकार सभी सरकारी और निजी स्कूलों में राजस्थानी भाषा को विषय के रूप में उपलब्ध कराने के लिए ठोस और व्यापक नीति तैयार करे।
याचिका में उठाए गए थे कई मुद्दे
सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका में कहा गया था कि राजस्थानी भाषा को शिक्षा व्यवस्था और शिक्षक भर्ती परीक्षाओं, विशेष रूप से REET में पर्याप्त महत्व नहीं दिया जा रहा है। जबकि राज्य में करोड़ों लोग राजस्थानी भाषा बोलते और समझते हैं।
याचिकाकर्ताओं ने मांग की थी कि राजस्थानी भाषा को स्कूल शिक्षा में उचित स्थान दिया जाए ताकि नई पीढ़ी अपनी मातृभाषा और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी रह सके।
मातृभाषा में शिक्षा पर सुप्रीम कोर्ट का जोर
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि बच्चों की शुरुआती शिक्षा उनकी मातृभाषा या स्थानीय भाषा में होने से उनका बौद्धिक, भावनात्मक और सांस्कृतिक विकास बेहतर होता है।
कोर्ट ने यह भी माना कि मातृभाषा में पढ़ाई बच्चों की सीखने की क्षमता बढ़ाती है और उन्हें अपनी संस्कृति और परंपराओं से जोड़कर रखती है।
शिक्षा व्यवस्था में हो सकते हैं बड़े बदलाव
सुप्रीम कोर्ट के इस निर्देश के बाद राजस्थान सरकार को पाठ्यक्रम, शिक्षकों की उपलब्धता और भाषा शिक्षण से जुड़ी नई नीतियां तैयार करनी पड़ सकती हैं। माना जा रहा है कि आने वाले समय में स्कूलों में राजस्थानी भाषा की पढ़ाई को लेकर बड़े स्तर पर बदलाव देखने को मिल सकते हैं।
