तमिलनाडु की राजनीति में आज से एक नए दौर की शुरुआत मानी जा रही है। भारतीय राजनीति में इससे पहले भी ऐसे उदाहरण देखे जा चुके हैं। दिल्ली में अन्ना आंदोलन से निकले एक राजनीतिक दल ने भी भ्रष्टाचार विरोधी राजनीति के नाम पर सत्ता हासिल की थी और लगातार दस वर्षों तक प्रचंड बहुमत की सरकार चलाई। लेकिन समय के साथ वही दल अपने मूल उद्देश्यों से भटकता हुआ दिखाई दिया। सत्ता को परिवर्तन का माध्यम बताने वाली राजनीति धीरे-धीरे स्वार्थ, अंतर्कलह और भ्रष्टाचार के आरोपों में उलझती चली गई, जिसका परिणाम यह हुआ कि पार्टी की पकड़ कमजोर पड़ने लगी और संगठन में टूट के संकेत दिखाई देने लगे।
यही कारण है कि राजनीति में केवल सत्ता प्राप्त कर लेना ही सबसे बड़ी उपलब्धि नहीं माना जाता, बल्कि सत्ता के शिखर पर लंबे समय तक टिके रहना ही वास्तविक परीक्षा होती है। जनसमर्थन को स्थायी बनाए रखना, संगठन को एकजुट रखना, सहयोगियों को साधना और जनता की अपेक्षाओं पर लगातार खरा उतरना यही किसी भी नेता की सबसे बड़ी चुनौती होती है।
अब निगाहें विजय पर टिकी हैं। क्या वे अपनी लोकप्रियता को स्थायी राजनीतिक शक्ति में बदल पाएंगे? क्या वे अपने दल को टूटने से बचाकर लंबे समय तक संगठित रख पाएंगे? क्या वे सत्ता में बने रहने के लिए आवश्यक राजनीतिक संघर्ष, रणनीति और संतुलन साध पाएंगे?
बड़ा प्रश्न यह भी है कि क्या यह राजनीतिक लहर केवल तमिलनाडु तक सीमित रहेगी, या फिर आने वाले समय में इसका प्रभाव राष्ट्रीय राजनीति तक भी पहुंचेगा?
इन सभी प्रश्नों के उत्तर फिलहाल भविष्य के गर्भ में हैं। आने वाला समय ही तय करेगा कि विजय केवल एक क्षणिक राजनीतिक लहर साबित होंगे या फिर भारतीय राजनीति में एक स्थायी और प्रभावशाली अध्याय लिख पाएंगे।
